Prashant Kishor Reject Nitish Kumar’s Offer In Bihar? – कानों देखी : क्या नीतीश का ‘ऑफर’ ठुकराना महंगा पड़ेगा पीके को?

Prashant Kishor Reject Nitish Kumar’s Offer In Bihar? – कानों देखी : क्या नीतीश का ‘ऑफर’ ठुकराना महंगा पड़ेगा पीके को?


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जद (यू) के पूर्व नेता पवन वर्मा ने मुलाकात की जमीन बनाई। प्रशांत किशोर से मिलने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सिफारिश की और राजनीति के चतुर खिलाड़ी नीतीश ने समय देने में जरा भी देर नहीं लगाई। यह वही नीतीश कुमार हैं जो कुछ दिन पहले प्रशांत किशोर के बयानों को लेकर कह रहे थे कि न जाने क्या अंड बंड बकता रहता है। जद(यू) के अध्यक्ष ललन सिंह ने भी पीके को अब व्यवसायी बता डाला। खबर है कि अभी पीके खुद नहीं समझ पा रहे हैं कि वह आगे कैसे नीतीश के खिलाफ अक्रामक हों। वह नीतीश कुमार के जिस ऑफर को ठुकराने की बात कर रहे हैं, यह पीके के करीबियों को ही हजम नहीं हो रही है। उन्हें पीके के मिलने की योजना भी कम समझ में आ रही है। वहीं इस बारे में जद (यू) के एक बड़े नेता का कहना है कि पीके का काम हो गया। वह चाहे जितना एड़ी-चोटी का जोर लगा लें, लेकिन छब्बे बनने गए थे और दूबे बनकर लौट आए हैं।  

राजस्थान में कुछ ही महीने में अगले विधानसभा चुनाव का बुखार शुरू होने लगेगा। पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की वरिष्ठ नेता वसुंधरा राजे अपने अंदाज में पत्ते फेंट रही हैं। जोधपुर में तो उन्होंने कह भी दिया कि 2003 से राज्य की कमान संभाली है और तब से किसी चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। हालांकि केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह राजस्थान में चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर लड़ने की भूमिका तैयार कर रहे  हैं। अमित शाह की एक परेशानी और है। वसुंधरा से बैर रखने वाले पार्टी के नेताओं में भी सिर फुटौव्वल चल रही है। केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और अर्जुन राम मेघवाल में आजतक तालमेल ठीक चल रहा है। जबकि शेखावत और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पूनिया में पोस्टर वार चल रहा है। कभी पूनिया और शेखावत दोनों वसुंधरा के करीबी थे। अब सबकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं।वसुंधरा की ही तरह कर्नाटक में भाजपा के पास पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी हैं। येदियुरप्पा की भूख और महत्वाकांक्षा बिल्कुल वसुंधरा की तरह है। थमने का नाम नहीं ले रही है। दोनों का फार्मूला एक ही है कि या तो खेल में हम होंगे, नहीं तो खेल बिगाड़ देंगे। देखिए आगे क्या होता है?

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को साथ लाने की नीतीश कुमार ने कोशिश शुरू की है। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और शरद यादव नीतीश कुमार की इस योजना के साथी हैं। देखना है, आगे क्या होता है। नीतीश कुमार चाहते हैं कि उ.प्र. की समाजवादी पार्टी और बिहार का महागठबंधन उ.प्र. में कंधे से कंधा मिला ले। जद(यू) अध्यक्ष ललन सिंह का भी मानना है कि अगर अखिलेश की पार्टी नीतीश के साथ आ गई और दोनों उ.प्र. में मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ गए तो भाजपा 80 लोकसभा सीटों वाले उ.प्र. में 20 के अंदर ही सिमट जाएंगे। ललन सिंह और नीतीश कुमार के इस गणित के पीछे अगड़ा बनाम पिछड़ा की लड़ाई है। खुद शरद यादव भी मानते हैं कि जब जाति की राजनीति शुरू होती है तो धर्म का मामला थोड़ा ढीला पड़ जाता है। इस थ्योरी के पीछ एक सोच और है। वह यह कि अखिलेश साथ आएंगे तो दूसरे राज्यों में भी विपक्षी एकता को धार मिलेगी। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं से भी समीकरण साधने की योजना पर काम तेज कर दिया है।

जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का खेमा चैन की सांस ले रहा है। हालांकि उसे पता है कि सचिन पायलट के आवास पर पार्टी के कार्यकताओं की अच्छी खासी भीड़ हो जाती है। लेकिन इस भीड़ से कुछ नहीं होने वाला। अब तो चुनाव में भी कोई ज्यादा समय नहीं बचा है। गुजरात विधानसभा चुनाव खत्म होते-होते राजस्थान में विधानसभा के लिए पार्टी के भीतर कसरत शुरू होने लगेगी। इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का सपना देखने वाले सचिन पायलट को 2028 का इंतजार करना चाहिए। सचिन के एक करीबी विधायक का कहना है कि राजस्थान स्विंग स्टेट है। वैसे भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ऐसा कुछ नहीं किया है कि राज्य में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो। हालांकि उन्हें उम्मीद है कि गुजरात विधानसभा चुनाव के खत्म होने तक राजस्थान में कुछ नया हो सकता है।

शरद पवार का एक तंज भाजपा के नेताओं में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ दिन पहले ही पवार ने तंज कसते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी ने छोटे बच्चे की तरह एकनाथ शिंदे को गुब्बारा थमा दिया है। शरद पवार ने यह तंज महाराष्ट्र से सेमीकंडंक्टर प्लांट के गुजरात चले जाने और मुख्यमंत्री शिंदे को पीएम से इसके एवज में मिले आश्वासन पर कसा था, लेकिन भाजपा के नेताओं को यह तंज पूरे महाराष्ट्र की सियासत पर सटीक दिखाई दे रहा है। दरअसल अब मुंबई महानगर पालिका का चुनाव सिर पर है। अभी तक शिवसेना का यहां दबदबा रहता था। पहली बार उद्धव ठाकरे की शिवसेना को यहां कड़ी चुनौती मिलने वाली है। यह चुनाव मुख्यमंत्री शिंदे के लिए अग्निपरीक्षा की तरह है। भाजपा इस बार थोड़ी बड़ी उम्मीद पाल रही है। इसी को ध्यान में रखकर अभी महाराष्ट्र सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार भी रुका हुआ है। लेकिन एनसीपी के नेता कहते हैं कि सभी उम्मीदें धरी की धरी रह सकती हैं। क्योंकि मुख्यमंत्री शिंदे गुब्बारे से खेल रहे हैं। अब जब तक गुब्बारे में हवा है, तबतक ही तो वह खेलेंगे।

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जद (यू) के पूर्व नेता पवन वर्मा ने मुलाकात की जमीन बनाई। प्रशांत किशोर से मिलने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सिफारिश की और राजनीति के चतुर खिलाड़ी नीतीश ने समय देने में जरा भी देर नहीं लगाई। यह वही नीतीश कुमार हैं जो कुछ दिन पहले प्रशांत किशोर के बयानों को लेकर कह रहे थे कि न जाने क्या अंड बंड बकता रहता है। जद(यू) के अध्यक्ष ललन सिंह ने भी पीके को अब व्यवसायी बता डाला। खबर है कि अभी पीके खुद नहीं समझ पा रहे हैं कि वह आगे कैसे नीतीश के खिलाफ अक्रामक हों। वह नीतीश कुमार के जिस ऑफर को ठुकराने की बात कर रहे हैं, यह पीके के करीबियों को ही हजम नहीं हो रही है। उन्हें पीके के मिलने की योजना भी कम समझ में आ रही है। वहीं इस बारे में जद (यू) के एक बड़े नेता का कहना है कि पीके का काम हो गया। वह चाहे जितना एड़ी-चोटी का जोर लगा लें, लेकिन छब्बे बनने गए थे और दूबे बनकर लौट आए हैं।